कंचनपुर: इतिहास और परंपरा


परिवार का इतिहास केवल परंपराओं और वंश की बातों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और देश की राजनीति से भी गहराई से जुड़ा रहा है।
मेरे बाबा (दीनानाथ भारती) के बाबा तीन भाई थे। उनमें से एक कुंदन भारती से हमारा परिवार आगे बढ़ा। उनके दो भाई – विंध्याचल भारती और करिया भारती – महंत बने और समाज व धर्म सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
करिया भारती (महंत) हॉनरेरी मजिस्ट्रेट थे। यह पद मुख्यतः उन बड़े ज़मींदारों, समाज में प्रतिष्ठित व्यक्तियों या धार्मिक नेताओं को दिया जाता था। हॉनरेरी मजिस्ट्रेट कभी पैसे नहीं लेते थे और केवल न्याय तथा ईमानदारी से अपने कर्तव्य निभाते थे। उनकी चाल और आदेश से सभी डरते और मानते थे, चाहे पुलिस, थाने के अधिकारी हों या अन्य प्रशासनिक संस्थान। उनकी निडरता और सत्यप्रियता ने समाज में मिसाल कायम की और उनके सामने अन्याय टिक नहीं सकता था।
करिया भारती का संबंध उस समय के महान नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू से था। अक्सर करिया भारती, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में होने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यक्रमों और जन्मदिन में शामिल होने जाया करते थे।
कहते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर विशेष तौलदान उत्सव होता था, जिसमें उन्हें सोना, चांदी, अनाज और तरह-तरह की कीमती वस्तुओं से तोला जाता था। यह उनके वैभव और समाज में ऊँचे स्थान का प्रतीक था।
इसी बीच हमारे परिवार का एक बहुत बड़ा मुक़दमा राजवंश भारती से चला। यह मुक़दमा कंचनपुर की जमीन-जायदाद और संपत्ति से जुड़ा था। मुक़दमा बेहद बड़ा और पेचीदा था, जिसका असर स्थानीय स्तर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचा।
इस मुक़दमे में करिया भारती को कानूनी मदद की ज़रूरत हुई और इस मुक़दमे में पैरवी करने वाले कोई और नहीं बल्कि पंडित मोतीलाल नेहरू थे, जो उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट के सबसे नामी बैरिस्टरों में गिने जाते थे। मुक़दमा इतना अहम था कि इसके दस्तावेज़ इंग्लैंड तक पहुँचे। हमारे घर से आधिकारिक काग़ज़ात वहाँ भेजे गए और मोतीलाल नेहरू ने स्वयं इस मुक़दमे की पैरवी की। उनकी वकालत और ईमानदार मेहनत के परिणामस्वरूप यह मुक़दमा हमारे पक्ष में हुआ और हमारे कंचनपुर की ज़मीन पर अधिकार प्राप्त हुआ।
हमारा गाँव कंचनपुर अपनी पहचान सिर्फ खेत-खलिहान से नहीं, बल्कि अपनी मठिया से बनाता है।
यही मठ गाँव की सबसे बड़ी धरोहर है, जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने हाथों से बनाया और आज तक उसकी इज़्ज़त कायम है।
कहा जाता है कि 1931 में करिया बाबा (महंत) ने यहाँ पर अपना बड़ा आसन जमाया था। उस जमाने में जब भी बाबा घर से बाहर निकलते थे, तो पूरे गाँव में ऐलान हो जाता था –
“बड़का बाबा निकल गए हैं”।
लोग रास्ता छोड़कर खड़े हो जाते, घरों के दरवाज़े बंद हो जाते। इतनी इज़्ज़त और शान थी उस समय मठ और बाबा की।
हमारे पुरखों ने सिर्फ मंदिर ही नहीं बनाया, बल्कि इस गाँव को बसाने का काम भी किया।
ग़रीबों को आसरा दिया, उन्हें खिलाया-पिलाया और ज़मीन तक दान में दी।
कभी इस मठ में सैकड़ों गायें और बड़े-बड़े बगीचे हुआ करते थे।
यहीं से गाँव के लोगों की रोज़ी-रोटी और मदद होती थी।
आज भले ही वक्त बदल गया हो, लेकिन मठिया की इज़्ज़त अब भी लोगों के दिल में बसी हुई है।
गाँव का हर इंसान मानता है कि यह मठ सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि गाँव की शान और आत्मा है।
हमारा उपनाम – गोस्वामी की कहानी
मैं अपना नाम अमन गोस्वामी लिखता हूँ। कई लोग पूछते हैं – “गोस्वामी क्यों? भारती तो आपके पूर्वज लिखते थे।
इस पर मैंने एक बार अपने बाबा (दीनानाथ भारती) से पूछा। उन्होंने बताया कि इसके पीछे की कहानी यह है कि करिया भारती (महंत) के जो गुरु थे, वे अपने नाम के साथ “भारती” लिखा करते थे। उसी परंपरा को हमारे घर-परिवार ने भी अपनाया और “भारती” उपनाम लिखना शुरू कर दिया।
हमारा परिवार पुरी संप्रदाय से संबंधित था। आदि शंकराचार्य ने अपने संन्यासियों को दशनामी संप्रदाय में बाँटा था, जिसमें दस उपनाम आते हैं –
गिरि, पुरी, भारती, आश्रम, सरस्वती, अरण्य, वन, पर्वत, सागर, तीर्थ।
लेकिन संन्यासी परिवार या दशनामी संन्यासी जो घर लौट आए (गृहस्थ जीवन अपनाया), वे अक्सर अपने नाम के साथ “गोस्वामी” जोड़ने लगे।
बाद में, अपने परिवार और परंपरा की पहचान को बनाए रखने के लिए हमने अपने नाम के साथ “गोस्वामी” जोड़ना शुरू किया। दशनामी संन्यासियों में यह सामान्य था, जैसे “पुरी गोस्वामी” या “भारती गोस्वामी”।
गोस्वामी का अर्थ केवल एक उपनाम नहीं है।
यह ज्ञान, धर्म और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक है। यह हमें हमारी जड़ों, हमारे पूर्वजों के मार्ग और उनके आदर्शों से जोड़ता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी पहचान केवल वर्तमान में नहीं, बल्कि पीढ़ियों के ज्ञान, संस्कार और जिम्मेदारियों में भी निहित है।
इसलिए जब मैं अमन गोस्वामी लिखता हूँ, तो यह सिर्फ नाम नहीं, बल्कि हमारी पहचान, विरासत और गुरु-परंपरा का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि अपने इतिहास और संस्कारों को समझना और आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।
हमारा उपनाम हमें प्रेरित करता है – सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए सही मार्ग दिखाने के लिए भी जीना। यही कारण है कि “गोस्वामी” हमारे लिए केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक और सम्मान का प्रतीक है।
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Written by

Aman Goswami
Aman Goswami
B.Tech (Hons.) graduate from NIET with 8.07 CGPA. Curious about how AI is changing the world and passionate about simplifying tech for non-tech folks. Currently blogging about AI, future of work, and career insights in the digital age.